लोहड़‍ी उत्सव का पर्वtopjankari.com

लोहड़‍ी उत्सव का पर्व

लोहड़‍ी उत्सव का पर्व.

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आज लोहड़ी का पर्व है और कल मकर सक्रांति। इन दोनों उत्सवों को मनाने की जोरदार तैयारी हो चुकी है। परिवार के सदस्यों के साथ लोहड़ी पूजन की सामग्री जुटाकर शाम होते ही विशेष पूजन के साथ आग जलाकर लोहड़ी का जश्न मनाया जाएगा। इस उत्सव को पंजाबी समाज जोशो-खरोश से मनाता है। लोहड़ी मनाने के लिए लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखे जाते हैं। समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवडी एवं मूँगफली का भोग लगाया जाता है।

भारत में अधिकतर किसानी के त्योहारों की तरह, लोहड़ी  भी किसानों की फ़सल कटने पर मनाया जाने वाला उत्सव से संबंधित है। यह पंजाब में फसल कटाई के मौसम और सर्दी के मौसम के अंत के तौर पर मनाया जाता है। पंजाब के अलावा यह त्यौहार हरयाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर व दिल्ली में भी मनाया जाता है| लोहरी आमतौर पर देश के अधिकांश हिस्सों में मकर संक्रांति के रूप में जाने वाले दिन यानी की पौष के अंतिम दिन आता है।
लोहरी का इतिहास
पंजाबी किसान भी लोहड़ी (माघी) को वित्तीय दिवस के रूप में देखते हैं। इस समय किसान भाई फसल काटने से पहले फसल के लिए भगवान की प्रार्थना और धन्यवाद करते हैं। इस त्यौहार को पंजाब में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है, यह त्यौहार किसानों के लिए उनके प्रभु व गुरु को धन्यवाद करने का एक दिन है। चांद कैलेंडर के अनुसार लोहड़ी की रात को वर्ष की सबसे लंबी रात माना जाता है।इस साल यह त्यौहार शनिवार, 13 जनवरी 2020 को मनाया जाएगा|

लोहड़ी क्यों मनाई जाती है

लोहरी का त्यौहार पंजाब व आसपास के प्रदेशो में खुशहाली के साथ मनाया जाता है | यह रबी फसलों की फसल काटने का अवसर है, जो कि सर्दियों में बोई गयी जाता है। तो इस त्योहार का मुख्य आकर्षण सर्दियों के भोजन जैसे सरसों का साग (सरसों दा साग), मक्के दी रोटी, तिल, रेवड़ी, गजक आदि होते हैं। तिल और गुड़ को पारंपरिक भोजन के रूप में खाया जाता है | तिल और रोरि (गुड) के शब्दों को एक साथ मिलाकर ‘तिलोही’ बनता हैं, और अंततः इस त्यौहार को लोहड़ी के नाम से जाना जाता है।

अलाव इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अलाव अग्नि का प्रतीक है, लोग इस अलाव के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, गीत गाते हैं और गजक, चिक्की, फूला हुआ चावल, पॉपकॉर्न, रेवड़ी, तिल के बीज, गुड़, मूंगफली और गन्ने को आग में अर्पित करते हैं। त्योहार के बाद लोग रात्रि में भोज करते है जिसमे स्वादिष्ट पकवान बने होते है जैसे की ‘सरसों का साग और मक्के की रोटी


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This Article In English -

Today is the festival of Lohri and tomorrow Makar Sakranti. Strong preparations have been made to celebrate both these festivities. The gathering of Lohri Pujan with the family members will be celebrated as soon as the evening is lit by burning a fire with special worship. Punjabi society celebrates this festival with gusto. To celebrate Lohri, dried stems are also placed on the stack of wood. After worshiping Lohri with the group, sesame, jaggery, revdi and peanuts are offered to it.

Like most harvest festivals in India, Lohri is also related to the festivities observed when farmers are harvested. It is celebrated in Punjab as the harvesting season and the end of the winter season. Apart from Punjab, this festival is also celebrated in Haryana, Himachal Pradesh, Jammu Kashmir and Delhi. Lohri usually falls on the last day of Paush i.e. the day known as Makar Sankranti in most parts of the country.

Punjabi farmers also see Lohri (Maghi) as a financial day. At this time, the farmer brothers pray and thank God for the harvest before harvesting. This festival is celebrated with great enthusiasm in Punjab, a day for the farmers to thank their Lord and Guru. According to the moon calendar, Lohri night is considered to be the longest night of the year. This year this festival will be celebrated on Saturday, 13 January 2020.

The bonfire is an important part of this festival. The bonfire is a symbol of fire, people gather around this bonfire, sing songs and offer gajak, chikki, puffed rice, popcorn, revdi, sesame seeds, jaggery, peanuts and sugarcane to the fire. People feast at night after the festival, in which delicious dishes are made such as 'mustard greens and maize bread'